अरुण जैमिनी

वर्तमान कविसम्मेलन के स्वरुप में जो लोग यहाँ सबसे फिट बैठते हैं उनमें से एक नाम अरुण जैमिनी जी का होता है।  इस दौर के मंच पर स्थापित कवियों में उन्हें  दूसरी पीढ़ी का कहाँ जा सकता है।  मंचीय  माहौल  उन्हें विरासत में मिला  उनके पिता  श्री जैमिनी हरयाणवी जी अपने दौर के लोकप्रिय हास्य कवि रहे हैं  किसी  चीज़ का  विरासत में मिल जाना बहुत आसान होता है लेकिन कला के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। कला किसी को विरासत में नहीं मिलती और जो लोग इसे विरासत समझ लेते हैं वे कला के साथ कभी न्याय नहीं कर पाते ,अरुण जी ने विरासत में मिले कविता के माहौल को अपने अनुरूप बना लिया और शुरू हो गया एक ऐसे कवि का मंचीय सफर जो अपने लतीफ़ों की सहज अदायगी के लिए पूरी  दुनिया में जाना पहचाना गया।  अरुण जी का एक अलग रंग है हिंदी मंचीय हास्य कविता के साथ लतीफों का चलन चल पड़ा है, लेकिन उन लतीफों से भरपूर हास्य निकलना और उन्हें भारतीय जनमानस के साथ आत्मसात कर देना ताकि सुनने वाला भी स्वयं को उसी लतीफे का पात्र महसूस करे या उसे कहीं अपने आसपास के समाज में घटता हुआ महसूस करे, लतीफों के विषय में ये अदा केवल अरुण जी को आती है बहुत सारे नए लोग कोशिश करते हैं लतीफों को उनकी तरह पेश करने की , शायद यही किसी वयक्ति की कामयाबी का चरम कहा जा सकता है कि उसकी अगली पीढ़ी उसको फॉलो करने की कोशिश करे। 

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