अनिल चौबे

वैसे तो मंच पर बहुत सारी विधाओं के साथ अनेकानेक कवि अपना साहित्यिक सफर करते हैं लेकिन इन सारी विधाओं में घनाक्षरी चंद एक लम्बे अरसे से मंच पर अपनी उपस्थिति मज़बूती  बनाये हुए है बात चाहे पारिवारिक , सामाजिक सरोकारों की हो राजनिरीक व्यंग की  हो ,  देश प्रेम या  श्रृंगार की घनाक्षरी छन्द  हर विचार और सोच को अपने आप में बाँधने की क्षमता रखता है अतीत से आज तक हास्य में भी घनाक्षरी छन्द  का अपना महत्त्व रहा है आज भी हास्य के कई कवि हैं जो घनाक्षरी में अपननी बात अधिक प्रभावी तरीके से कह पाते हैं ऐसा ही एक नाम है अनिल चौबे का जो काफी लम्बे समय से मंच पर हास्य कवि के रूप में स्थापित हैं अनिल जी का घनाक्षरी पर महारत है उनके विषय भी आम ज़िंदगी से उठाये हुए होते हैं जिनमें पारिवारिक उन्मुक्तता,  सामजिक विसंगतियां एवं राजनितिक व्यंग सब शामिल होते हैं ऐसा नहीं है कि  हास्य में छन्द कहने वाले और नहीं हैं लेकिन अनिल जी का अंदाज़े बयां कुछ अलग है वो बात को इतनी बारीकी से कहते हैं कि हास्य का दायरा सिर्फ़ मंच तक नहीं रहता  बल्कि हँसी घर तक पीछा करती है हिंदी मंच पर हास्य की एक लम्बी फहरिस्त होने के बावजूद अनिल जी का जादू दिनों दिन बढ़ रहा है  उनके वारे में जो एक खास बात बड़े दावे के साथ कही जा सकती है वो यह है कि उनके विषय पूर्णतया  मौलिक होते हैं   नवीन  होते है  और बहुत महत्वपूर्ण होते हैं

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