अशोक चक्रधर

कुछ लोग जब किसी क्षेत्र में कदम रखते हैं तो वे वहां की पुरानी रवायतों के खिड़की दरवाज़ों को या तो खोल कर या तोड़ कर एक नई परम्परा गढ़ने के लिए जाने जाते है कविसम्मेलन में एक ऐसी ही नई परम्परा की शुरुआत जिस शख्स ने की उनका नाम होता है अशोक चक्रधर जिस दौर में कविसम्मेलन कुछ गढ़े गढ़ाए मानकों पर चल रहा था उस  समय अशोक जी ने एक नया रस मंच को दिया उस रस का नाम है बतरस कविता का एक ऐसा स्वरूप जिसमें शब्द नए अर्थ गढ़ते हैं और अर्थ कुछ नए शब्दों को स्वतः ही धारण  करते चले जाते  है ऐसा नहीं है इस तरह का काम करने वाले अशोक जी पहले व्यक्ति थे प्रयोग तो उनसे पहले भी होते रहे,  लेकिन बतरस के उस प्रयोग को एक एकेडमिक स्वरूप या यूँ कहें कि बतरस को सलीके से कहने की कला अशोक जी ने विकसित की , वो जब धारा प्रवाह बोलते हैं तो सुनने वालों को ये अहसास ही नहीं रहता कि वक़्त कितना गुज़रा, उनका सञ्चालनिय कौशल और कविताओं में गढ़ा गया उनका शब्द विन्यास उन्हें हिंदी मंच पर सबसे अलग शीर्ष पर खड़ा करता है, इस सबसे अलग उनकी सादगी उनके व्यक्तित्व  को और भी महान बनाती  है इस सबसे अलग उनका नाम इस बात के लिए भी जाना जाता है कि उन्होंने पहली बार वाह वाह नाम से कविता के एक ऐसे कार्यक्रम की शरुआत की जिसने न सिर्फ  कविता को  बल्कि कवियों को भी लोकप्रिय बनाया और tv के माध्यम से कविता को घर घर तक पहुँचाया

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