दिनेश बावरा

हिंदी मंच पर हास्य आज उसी तरह शामिल है जैसे खाने में नमकीन और कुछ चटपटे व्यंजन लेकिन उसकी  अदायगी कुछ अलग अलग है मतलब पहली पंग्ति  के कवि अपनी अलग शैली  के साथ प्रस्तुति देते है मसलन किसी का छन्द पर महारत है तो किसी का लतीफों पर कोई विशुध्द हास्य व्यंग कविताओं के साथ अपने सफर पर है तो किसी ने पैरोडी को हास्य का माध्यम बनाया,  लेकिन इन सब के बीच एक नाम मंच से होता हुआ लाफ्टर में गया वहां अपना तेवर दिखाया , वह आज भी अपने उसी तेवर के साथ हिंदी मंच के सफर पर है नाम है दिनेश बावरा दिनेश जी का हास्य कई मायनो में दूसरों से थोड़ा इतर है वहा न लतीफों का आधिक्य है न व्यंग के नाम पर  लम्बी कविता,  न ही अत्यधिक राजनितिक टिप्पड़ियों की भरमार बस थोड़ा थोड़ा सब है शायद यही   एक बात है जो दिनेश जी को सबसे अलग  और  कुछ खास बनाती है जिन लोगों ने कभी मुंबई में खाना खाया है वे जानते होंगे कि वहां एक थाली में छोटी छोटी कटोरियों के बीच थोड़ा थोड़ा काफी कुछ होता है चूँकि दिनेश जी का बचपन मुंबई में बीता है शायद उसी मुम्बइया थाली का प्रभाव दिनेश जी के प्रतुतिकरण पर भी है उनके हास्य में सामजिक सरोकारों के साथ कुछ सांस्कारिक मिठास भी ही उनका हास्य हवा में उड़ाने के लिए नहीं है बल्कि साथ ले जाने और देर तक महसूस करने के लिए है यही उनकी सकारात्मकता है के कि वो हास्य के साथ एक सन्देश छोड़ते हैं |

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