मुनव्वर राना

कविसम्मेलन का जिस तरह का मिजाज़ है उसमें शायरी को उस स्तर की कामयाबी आज के दौर में हासिल नहीं है जिस तरह की आज से 35 -४० वर्ष पहले हुआ करती थी  जैसे जैसे वक्त बदला कविसम्मेलन के विषय भी बदलते रहे लेकिन इन  सब परस्थितियों के बावजूद मुशायरों से निकल कर कुछ शायरों से हिंदी मंच पर अपनी जगह बनाई उन्ही में से एक नाम मुनव्वर राणा जी का है जो बड़े ही अदब और अहतराम के साथ उर्दू एवं हिंदी मंचों पर लिया जाता है मुनव्वर साहब की शायरी को यदि एक वाक्य बांधना हो तो कहा जा सकता है कि उनकी शायरी में वो गहराई है जो  डूब जाने के बाद ज़िंदगी का अहसास दिलाती है वो रिश्तों के शायर है उनको सुनते हुए लगता है जैसे परिवार में तीनों पीढ़ियां बैठी हों और एक दुसरे को सम्बल दे रहीं हों उनकी शायरी में रिश्ते इतने करीब से महसूस होते हैं कि उन्हे फिर से परिभाषित करने का मन करता है उनके अनगिनत शेर पूरी दुनिया के कविता और ग़ज़ल प्रेमियों की ज़ुबान पर तैरते रहते है जैसी सपाट उनकी शायरी है वैसा ही सपाट उनका पढ़ने का अंदाज़ है वो शेर को पेश करने में कोई चासनी नहीं मिलाते लेकिन फिरभी उनके शेर ऐसी मिठास के साथ ज़हनों में उतरते हैं कि फिर निकाले नहीं निकलते उनको सुन्ना जैसे ज़िदगी को  हाथों में लेकर उससे कुछ अंतरग बातें करना

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