सुमन दुबे

जब से सोसिअल मिडिया का चलन समाज में बढ़ा है तब से कविता सुनी भी जाती है और देखी भी मंच पर हर रोज़ बढ़ते हुए गिलेमर का असर ये है कि आज मंच के कवियों का ड्रेसिंग सेन्स बदल रहा है खड़े होने का स्टाइल बैठने का तरीका यहाँ तक बालों का स्टाइल भी महत्वपूर्ण हो गया है मंच पर खूबसूरती किसे अच्छी नहीं लगती लेकिन उस ख़ूबसूरती के साथ सप्तम स्वर मेँ गूँजती आवाज़ जब शब्दों को नए आयाम देती है तो ज़हन में एक ही नाम उभरता है सुमन दुबे जिसने भी पपीहे की आवाज़ सुनी होगी वो ज़रूर बता सकता है कि कौन स्वरों को बहतर साधता है किसकी साधना अधिक है उस स्वर के साथ अगर श्रृंगार में  डूबे शब्द भी हों तो उन्हें कौन नहीं सुन्ना चाहेगा  एक अर्से से उन्होंने मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रख्खी है हिंदी मंच की पहली कतार की अगर बात की जाए तो उसमें जो गिने चुने नाम होंगे उनमें सुमन जी का नाम ऊपर की पायदान पर होगा सुमन जी सबसे खास बात उनका सधा हुआ स्वर है कविता की वाचिक परंपरा में महत्त्व सिर्फ शब्दों का ही नहीं होता उनको दी गई आवाज़ का भी होता है सुमन जी के वारे मेँ कहा जा सकता है है कि ईश्वर की उनपर असीम अनुकम्पा रही है लेकिन मंच का एक दूसरा यथार्त यह भी है कि शब्दों के बगैर स्वर बेमानी है सुमन जी का दोनों पर बराबर अधिकार है उनका हर शब्द एक अलग प्रभाव छोड़ता है

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