प्रदीप चौबे

कभी कभी एक कलाकार की बढ़ती लोकप्रियता का दवाब  उसको उसके मूल में कुछ परिवर्तन करने के लिए या तो मजबूर कर देता है या प्रोत्साहित करता है। मगर कुछ होता ज़रूर है, हर चहरे पर एक हास्य कवि के रूप में अपनी पहचान छोड़ने वाले प्रदीप चौबे जी मूल रूप से एक शायर हैं ,लेकिन जब वो मंच पर होते हैं तो शायद ही कोई यह कल्पना करे कि अपनी व्यंगात्मक शैली से लोगो के दिलों में गुदगुदाहट का एक विशाल वृक्ष रोपित कर देने वाले प्रदीप जी शायर भी हो सकते हैं।  पिछले लगभग 40 वर्षों में उन्होंने जो  मक़ाम हिन्दी मंच पर हासिल किया, वो विरले ही लोगो को मिलता है कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात यह प्रदीप जी के कहन की विशेषता रही है।  हास्य के शीर्ष कवियों की अगर कोई लिस्ट बने तो प्रदीप जी उसमें भी शीर्ष पर ही नज़र आते हैं, उनका अंदाज सबसे जुदा है जहाँ हास्य के नाम पर कुछ लोग सिर्फ़ चुटकुलों और टिप्पणियों पर निर्भर रहते हैं ,वहीं प्रदीप जी ने आलपिन के रूप में हास्य की एक नई विधा ऐजाद की जिसके द्वारा वो गम्भीर से गम्भीर बात भी वो बड़ी सहजता से कह देते हैं, जो न सिर्फ़ उनको सुनते वक्त बल्कि बाद में भी हास्य अनुभूति कराती रहती है। उनका हास्य ज़िंदगी के कुछ छुए अनछुए पहलुओं से सहजता से निकलता है जो दिल तक मार करता है। 

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